विकास की सनक में नए दलित वर्ग का निर्माण

Editorial Analysis
Published: May 09, 2026 | Editor in Chief

The Illusion of Development and the Creation of the 'New Dalit'

This editorial critically examines the contemporary paradigm of 'Smart' urban development and institutional expansion in India. The author argues that beneath the veneer of grand inaugurations and infrastructure growth lies a systemic erosion of public institutions and the marginalization of the working class. By analyzing the crisis in academic and medical institutions (IITs, AIIMS, and Ayurvedic colleges) alongside the forced displacement of urban slum dwellers, street vendors, and tribal communities, the article identifies a concerning socio-economic phenomenon: the deliberate creation of a 'New Dalit' class. This class is characterized by systematic exclusion from the mainstream economy, cultural uprooting, and a forced transition into precarious, contract-based labor. The author concludes that this 'Growth without Inclusion' represents a regression into a primitive, exploitative structure, hidden behind the arrogance of modern developmental achievements.

शहरों को 'स्मार्ट' बनाने की जो सनक आज प्रशासनिक गलियारों में सवार है, वह दरअसल हमें आधुनिकता की ओर नहीं, बल्कि एक नई किस्म की आदिकालीन और बर्बर व्यवस्था की ओर धकेल रही है। हम बड़े-बड़े मंचों से इन हाशिए के लोगों को 'मुख्य धारा' में लाने की थोथी घोषणाएं तो करते हैं, लेकिन वास्तविकता में हमारी हर नीति इन्हें मुख्य धारा से काट देने के षड्यंत्र जैसी ही है। विकास का यह बुलडोजर जब किसी झुग्गी या रेहड़ी-पटरी पर चलता है, तो वह केवल एक अवैध ढांचा नहीं गिराता, बल्कि उस इंसान की नागरिकता और अस्मिता को भी कुचल देता है। यह एक अत्यंत खतरनाक और सोची-समझी प्रक्रिया है—एक 'नए तरह का दलित' बनाने की प्रक्रिया। यही विनाशकारी मॉडल आज हमारे आदिवासी अंचलों में भी पूरी क्रूरता के साथ लागू किया जा रहा है। जिस जल-जंगल-जमीन को आदिवासियों ने सदियों से संजोया, उसे 'राष्ट्रीय विकास' और 'खनिज संपदा' के नाम पर उनसे छीना जा रहा है। विकास की बड़ी परियोजनाओं और बाँधों के नाम पर होने वाला यह विस्थापन आदिवासियों को उनकी सांस्कृतिक जड़ों और प्राकृतिक संसाधनों से काटकर शहरों की मलिन बस्तियों में एक 'सस्ता मजदूर' बनने के लिए छोड़ देता है। यह विस्थापन केवल भौगोलिक नहीं है; यह एक पूरी सभ्यता को उसकी पहचान से बेदखल कर उसे 'आधुनिक दासता' की ओर धकेलने जैसा है। विडंबना देखिए, जिनके जंगलों से देश का उद्योग चलता है, वे स्वयं अपनी ही जमीन पर 'अतिक्रमणकारी' घोषित कर दिए जाते हैं।

ऐतिहासिक रूप से जिन्हें हाशिए पर रखा गया, उनके साथ जो हुआ सो हुआ, लेकिन आज का यह कथित आधुनिक तंत्र आर्थिक और प्रशासनिक स्तर पर एक नया 'वंचित वर्ग' खड़ा कर रहा है। उजाड़े गए ये लोग कहाँ जाते हैं? चाहे वे शहर की झुग्गियों से उजाड़े गए हों या जंगलों से विस्थापित किए गए आदिवासी हों—ये सभी चकाचौंध से दूर उन अंधेरे कोनों में फेंक दिए जाते हैं जहाँ न सम्मान है, न सुरक्षा। यह उन्हें फिर से उसी आदिम अवस्था में धकेलने जैसा है जहाँ जीवन केवल अस्तित्व बचाने का एक दैनिक संघर्ष मात्र रह जाता है। व्यवस्था को इनका श्रम और इनके संसाधन तो चाहिए, लेकिन इनकी मौजूदगी उसकी आंखों में चुभती है। इसीलिए, इन्हें पहले इस्तेमाल किया जाता है और फिर 'अतिक्रमण' या 'बाधा' का ठप्पा लगाकर कूड़े की तरह हाशिए के बाहर फेंक दिया जाता है।

जब एक बस्ती उजड़ती है या एक आदिवासी गाँव खाली कराया जाता है, तो केवल छत नहीं गिरती, बल्कि अगली पीढ़ी का भविष्य भी दफन हो जाता है। स्कूल जा रहे बच्चे की उम्मीदें टूट जाती हैं और उसे फिर से वही 'लाचार श्रमिक' बनने को मजबूर कर दिया जाता है जो कभी अपने अधिकारों के लिए आवाज न उठा सके। यह विकास नहीं, बल्कि एक 'व्यवस्थित बहिष्कार' है। हम सड़कों को तो चौड़ा कर रहे हैं और खदानों को गहरा, लेकिन अपने सामाजिक और नैतिक दृष्टिकोण को इतना संकुचित कर चुके हैं कि उसमें गरीब और मूल निवासी के लिए कोई जगह नहीं बची।

यह नया आर्थिक विभाजन हमें एक ऐसे भविष्य की ओर ले जा रहा है जहाँ विकास के 'टापू' तो होंगे, लेकिन उनके चारों ओर लाचारी और विस्थापन का एक अंतहीन समंदर होगा, जिसे हमने खुद अपनी 'सफलता' के अहंकार से सींचा है। सबसे दुखद पक्ष यह है कि इन विस्थापितों और उपेक्षितों की पीड़ा आज किसी भी राजनीतिक दल, मुख्यधारा के मीडिया या बौद्धिक विमर्श के एजेंडे का हिस्सा नहीं है। सत्ता पक्ष के लिए ये विकास के मार्ग की बाधा हैं और विपक्ष के लिए शायद इतने महत्वपूर्ण 'वोट बैंक' नहीं कि इनके लिए व्यवस्था से टकराया जाए। मीडिया के कैमरों को उद्घाटनों के शोर में इन उजड़ी बस्तियों और सूने होते जंगलों की खामोशी सुनाई नहीं देती।

यह सामूहिक उपेक्षा ही 'नए दलित' को बनाने की इस प्रक्रिया को और भी क्रूर बना देती है। जब समाज का जागरूक हिस्सा अपनी आँखों के सामने होते अन्याय को देखना छोड़ दे, तो सत्ता और पूंजी का गठजोड़ बेलगाम हो जाता है। इन्हें मुख्य धारा से काट देने की यह सुनियोजित साजिश अब एक 'स्वीकार्य सच' बन चुकी है। हम एक ऐसे समाज में तब्दील हो रहे हैं जहाँ करोड़ों की आबादी को सिर्फ इसलिए अदृश्य कर दिया जाता है क्योंकि वे 'स्मार्ट' दिखने के आधुनिक मानकों में फिट नहीं बैठते। अंततः, यह केवल एक बस्ती या गाँव का उजड़ना नहीं है, बल्कि हमारे सामूहिक विवेक और लोकतंत्र की उस मूल भावना का पतन है जो 'अंतिम व्यक्ति' के उत्थान का दावा करती थी।

Dr. R. Achal

डॉ. आर. अचल पुलस्तेय

Editor-in-Chief, Eastern Scientist

Multidisciplinary scholar focusing on socio-economic transitions and geopolitical shifts in the Eastern hemisphere.

ORCID iD: 0009-0002-8240-2689

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